पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ - अक्टूबर 25, 2026 को 11:55 AM
पूर्णिमा तिथि समाप्त - अक्टूबर 26, 2026 को 09:41 AM
शरद पूर्णिमा हिंदू धर्म की सबसे पवित्र पूर्णिमाओं में से एक है। इसे कोजागरा पूर्णिमा, कौमुदी पूर्णिमा और ब्रज क्षेत्र में रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह पर्व आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। हिंदू धर्म में सोलह कलाओं को पूर्णता और आदर्श व्यक्तित्व का प्रतीक माना जाता है। भगवान श्री कृष्ण को सोलह कलाओं से परिपूर्ण तथा भगवान विष्णु का पूर्णावतार माना जाता है, जबकि भगवान श्री राम को परंपरागत रूप से बारह कलाओं से युक्त अवतार बताया जाता है।
शरद पूर्णिमा की खीर का महत्व
शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणों को अमृतमयी मानने की धार्मिक मान्यता है। इसी कारण इस दिन गाय के दूध और चावल से बनी खीर को रातभर चंद्रमा की रोशनी में रखने की परंपरा है। अगले दिन सुबह खीर को भगवान को भोग लगाने के बाद प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में बाँटा जाता है।
ब्रज क्षेत्र में खीर के साथ पाग नामक पारंपरिक मिठाई बनाने की भी परंपरा है। लोकमान्यताओं में इसे स्वास्थ्य और नेत्रों की ज्योति के लिए लाभकारी माना जाता है। हालाँकि, चंद्रमा की किरणों से खीर में औषधीय गुण उत्पन्न होने के दावों के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
शरद पूर्णिमा और श्री कृष्ण की महारास लीला
ब्रजभूमि में शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इसी पावन रात्रि में भगवान श्री कृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ दिव्य महारास किया था।
कहा जाता है कि श्री कृष्ण की बाँसुरी का मधुर संगीत सुनकर गोपियाँ उनकी ओर आकर्षित हुईं। महारास के दौरान भगवान श्री कृष्ण ने प्रत्येक गोपी के साथ अलग-अलग रूप में नृत्य किया। इस दिव्य लीला को प्रेम, भक्ति और आत्मा के परमात्मा से मिलन का प्रतीक माना जाता है।
कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण ने महारास की रात्रि को दिव्य रूप से विस्तृत कर दिया था। यह प्रसंग उनकी अलौकिक लीलाओं और दिव्य शक्ति को दर्शाता है।
शरद पूर्णिमा पर व्रत और पूजा
शरद पूर्णिमा के दिन चंद्र देव की पूजा और व्रत रखने का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालु भगवान विष्णु, श्री कृष्ण और चंद्र देव की आराधना करते हैं तथा रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित करते हैं।
कुछ परंपराओं में नवविवाहित सौभाग्यवती स्त्रियाँ शरद पूर्णिमा से प्रत्येक पूर्णिमा का व्रत प्रारंभ करती हैं। पूजा-विधि और व्रत के नियम क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
कोजागरा पूर्णिमा और शरद पूनम
भारत के कई क्षेत्रों में शरद पूर्णिमा को कोजागरा पूर्णिमा कहा जाता है। 'कोजागरा' शब्द का संबंध संस्कृत के प्रश्न 'को जागर्ति?' से माना जाता है, जिसका अर्थ है, 'कौन जाग रहा है?' मान्यता है कि इस रात माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जागरण करने वाले भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। इसी कारण इस दिन माता लक्ष्मी की पूजा और रात्रि जागरण की परंपरा है।
गुजरात में शरद पूर्णिमा को शरद पूनम के नाम से जाना जाता है। इस अवसर पर पारंपरिक गरबा, रास और अन्य सांस्कृतिक आयोजन किए जाते हैं।
शरद पूर्णिमा का आध्यात्मिक संदेश
शरद पूर्णिमा प्रेम, भक्ति, शांति और आध्यात्मिक पूर्णता का पर्व है। भगवान श्री कृष्ण की महारास लीला दिव्य प्रेम और समर्पण का संदेश देती है, जबकि खीर और प्रसाद बाँटने की परंपरा परिवार में प्रेम तथा एकता की भावना को बढ़ाती है।
इस पावन अवसर पर श्रद्धालु भगवान श्री कृष्ण, भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और चंद्र देव की पूजा करके सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।






