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ॐ जय शिव ओंकारा भगवान शिव की अत्यंत प्रसिद्ध आरती है, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को प्रणव अक्षर ॐ में एक बताया गया है और कैलाशवासी, गंगाधर, त्रिशूलधारी महादेव के स्वरूप का गुणगान है। इसे सोमवार, प्रदोष, सावन मास और महाशिवरात्रि पर शिव पूजा के अंत में विशेष श्रद्धा से गाया जाता है।
मुख्य बातें
यह आरती भगवान शिव के ओंकार स्वरूप को समर्पित है।
आरती में ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को प्रणव अक्षर ॐ में एक बताया गया है।
शिव जी के जटा में गंगा, गले में मुण्डमाला और शेषनाग का वर्णन है।
काशी में विराजे विश्वनाथ और नन्दी ब्रह्मचारी का उल्लेख आरती में है।
अंतिम पंक्ति में शिवानन्द स्वामी का नाम आता है।
॥ शिवजी की आरती ॥
ॐ जय शिव ओंकारा,स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव,अर्द्धांगी धारा॥१॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुराननपञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासनवृषवाहन साजे॥२॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुजदसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखतेत्रिभुवन जन मोहे॥३॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमालामुण्डमाला धारी।
त्रिपुरारी कंसारीकर माला धारी॥४॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बरबाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिकभूतादिक संगे॥५॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डलुचक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥६॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिवजानत अविवेका।
प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥७॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा।
पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥८॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
पर्वत सोहैं पार्वती,शंकर कैलासा।
भांग धतूर का भोजन,भस्मी में वासा॥९॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
जटा में गंगा बहत है,गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत,ओढ़त मृगछाला॥१०॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
काशी में विराजे विश्वनाथ,नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत,महिमा अति भारी॥११॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरतीजो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥१२॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शिव जी की आरती किस दिन करनी चाहिए?
शिव जी की आरती प्रतिदिन की जा सकती है, पर सोमवार को इसका विशेष महत्व माना जाता है। प्रदोष व्रत, पूरे सावन मास और महाशिवरात्रि पर शिव पूजा के बाद ॐ जय शिव ओंकारा आरती विशेष श्रद्धा से गाई जाती है।
शिव जी की आरती कैसे करें?
शिवलिंग या शिव प्रतिमा का जल, दूध और बेलपत्र से पूजन करने के बाद थाली में घी का दीपक या कपूर जलाएं। घंटी बजाते हुए श्रद्धा से ॐ जय शिव ओंकारा गाएं और अंत में आरती लेकर प्रसाद बाँटें।
ॐ जय शिव ओंकारा का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है: हे ओंकार स्वरूप भगवान शिव, आपकी जय हो। आरती बताती है कि ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव अलग दिखते हैं, पर प्रणव अक्षर ॐ के भीतर ये तीनों एक ही हैं, और अज्ञानी ही इन्हें अलग मानते हैं।
शिव जी की आरती गाने के क्या लाभ हैं?
आरती में शिव जी को सुखकारी, दुखहारी और जगपालन करने वाला कहा गया है। अंतिम पंक्ति के अनुसार जो कोई त्रिगुणस्वामी की यह आरती गाता है, उसे मनवांछित फल मिलता है। भक्त इसे मन की शांति और महादेव की कृपा के लिए गाते हैं।
शिव जी की आरती में किन स्वरूपों का वर्णन है?
आरती में शिव जी के एकानन, चतुरानन और पञ्चानन रूप, दो, चार और दस भुजाओं वाले स्वरूप, कैलाश पर पार्वती संग निवास, भांग धतूरे का भोग, भस्म, जटा में गंगा और काशी विश्वनाथ के रूप का वर्णन है।